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उद्योग पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनञ्जय़ः |  ३४   क
त्वय़ा सार्धं हृषीकेश श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति