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उद्योग पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
स्वप्ना हि वहवो घोरा दृश्यन्ते मधुसूदन |  ५   क
निमित्तानि च घोराणि तथोत्पाताः सुदारुणाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति