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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
स तु शक्त्या विभिन्नाङ्गो निपपात रथोत्तमात् |  १२   क
लोहिताङ्ग इवाकाशाद्दीप्तरश्मिर्यदृच्छय़ा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति