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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
तं तु दृष्ट्वा हतं शूरमश्वत्थामा महारथः |  १३   क
अभ्यधावत वेगेन शैनेय़ं प्रति संय़ुगे |  १३   ख
अभ्यवर्षच्छरौघेण मेरुं वृष्ट्या यथाम्वुदः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति