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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु समरे शूरो वृष्णीनां प्रवरो रथी |  ३४   क
व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धाद्युधिष्ठिरम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति