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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद्घटोत्कचः |  १७   क
रथिनामृषभं द्रौणिं धाराभिरिव तोय़दः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति