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वन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
ततः प्रध्माप्य जलजं पाञ्चजन्यमहं नृप |  २०   क
आहूय़ शाल्वं समरे युद्धाय़ समवस्थितः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति