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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे वाणानां सङ्ग्रामोऽन्य इवाभवत् |  २५   क
घोररूपो महाराज योधानां हर्षवर्धनः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति