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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते युद्धं द्रौणिराक्षसय़ोर्मृधे |  २८   क
विगाढे रजनीमध्ये शक्रप्रह्रादय़ोरिव ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति