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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
स तैरभ्याय़तैर्विद्धो राक्षसेन महावलः |  ३०   क
चचाल समरे द्रौणिर्वातनुन्न इव द्रुमः |  ३०   ख
स मोहमनुसम्प्राप्तो ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति