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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विमूढं हैडिम्वं सारथिस्तं रणाजिरात् |  ३७   क
द्रौणेः सकाशात्सम्भ्रान्तस्त्वपनिन्ये त्वरान्वितः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति