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द्रोण पर्व
अध्याय १२
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अर्जुन उवाच
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् |  १०   क
न त्वां द्रोणो निगृह्णीय़ाज्जीवमाने मय़ि ध्रुवम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति