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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
व्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिविकां मम |  ३६   क
स मामपनय़ो राजन्भ्रंशय़ामास वै श्रिय़ः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति