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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य भीमो धनुश्छित्त्वा ध्वजं च नवभिः शरैः |  ४४   क
विव्याध कौरवश्रेष्ठं नवत्या नतपर्वणाम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति