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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
स तदा छिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः |  ५१   क
शक्तिं चिक्षेप समरे सर्वपारशवीं शुभाम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति