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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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भीष्म उवाच
यत्तद्यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः |  २   क
लोकान्प्रतापय़न्सर्वान्यास्यस्मानवितर्कय़न् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति