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शान्ति पर्व
अध्याय १४२
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भीष्म उवाच
यस्तु धर्मं यथाशक्ति गृहस्थो ह्यनुवर्तते |  १८   क
स प्रेत्य लभते लोकानक्षय़ानिति शुश्रुम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति