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शान्ति पर्व
अध्याय १४२
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भीष्म उवाच
तद्व्रवीतु भवान्क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि |  २४   क
प्रणय़ेन व्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति