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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
निशीथे पाण्डवं सैन्यमाभ्यां पश्य प्रमर्दितम् |  ३४   क
गजाभ्यामिव मत्ताभ्यां यथा नडवनं महत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति