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वन पर्व
अध्याय १४२
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युधिष्ठिर उवाच
सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीय़सा |  १३   क
ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभय़स्य च ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति