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वन पर्व
अध्याय १४२
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युधिष्ठिर उवाच
दुर्वलाः क्लेशिताः स्मेति यद्व्रवीथेतरेतरम् |  २   क
अशक्येऽपि व्रजामेति धनञ्जय़दिदृक्षय़ा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति