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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुच्छ्रितम् |  ५२   क
चर्मनिस्त्रिंशय़ो राजन्निर्विशेषमदृश्यत ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति