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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरसदनं दृष्ट्वा राक्षसांश्च निपातितान् |  ९   क
भ्राता भ्रातरमासीनमभ्यभाषत पाण्डवम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति