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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
ते वृताः समरे पञ्च गजानीकेन भारत |  २४   क
अशोभन्त नरव्याघ्रा ग्रहा व्याप्ता घनैरिव ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति