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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
व्याकुलीकृत्य तं द्रोणो वृहत्क्षत्रं महारथम् |  २०   क
व्यसृजत्साय़कं तीक्ष्णं केकय़ं प्रति भारत ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति