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उद्योग पर्व
अध्याय १४२
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वैशम्पाय़न उवाच
पितामहः शान्तनव आचार्यश्च युधां पतिः |  १४   क
कर्णश्च धार्तराष्ट्रार्थं वर्धय़न्ति भय़ं मम ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति