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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे समन्ततः |  १६   क
वध्यमानेषु योधेषु तावकेष्वितरेषु च ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति