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उद्योग पर्व
अध्याय १४२
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वैशम्पाय़न उवाच
जानासि मे जीवपुत्रे भावं नित्यमनुग्रहे |  २   क
क्रोशतो न च गृह्णीते वचनं मे सुय़ोधनः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति