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उद्योग पर्व
अध्याय १४२
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वैशम्पाय़न उवाच
आ पृष्ठतापाज्जप्त्वा स परिवृत्य यतव्रतः |  ३०   क
दृष्ट्वा कुन्तीमुपातिष्ठदभिवाद्य कृताञ्जलिः |  ३०   ख
यथान्याय़ं महातेजा मानी धर्मभृतां वरः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति