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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
ससम्भ्रमस्ततस्तूर्णमवप्लुत्य रथोत्तमात् |  १०   क
सहदेवो महाराज दृष्ट्वा कर्णं व्यवस्थितम् |  १०   ख
रथचक्रं ततो गृह्य मुमोचाधिरथिं प्रति ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति