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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
अथैनं धनुषोऽग्रेण तुदन्भूय़ोऽव्रवीद्वचः |  १५   क
एषोऽर्जुनो रणे यत्तो युध्यते कुरुभिः सह |  १५   ख
तत्र गच्छस्व माद्रेय़ गृहं वा यदि मन्यसे ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति