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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
वधप्राप्तं तु माद्रेय़ं नावधीत्समरेऽरिहा |  १७   क
कुन्त्याः स्मृत्वा वचो राजन्सत्यसन्धो महारथः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति