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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
सहदेवस्ततो राजन्विमनाः शरपीडितः |  १८   क
कर्णवाक्षल्यतप्तश्च जीवितान्निरविद्यत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति