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द्रोण पर्व
अध्याय ११०
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धृतराष्ट्र उवाच
कर्णः पार्थान्सगोविन्दाञ्जेतुमुत्सहते रणे |  २   क
न च कर्णसमं योधं लोके पश्यामि कञ्चन |  २   ख
इति दुर्योधनस्याहमश्रौषं जल्पतो मुहुः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति