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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिविव्याध तं राजा नवभिर्निशितैः शरैः |  २३   क
पुनश्चैव त्रिसप्तत्या भूय़श्चैव शतेन ह ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति