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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
शतानीकस्ततो दृष्ट्वा भ्रातरं हतवाहनम् |  २६   क
रथेनाभ्यपतत्तूर्णं सर्वलोकस्य पश्यतः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति