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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं निवर्तध्वमलं मृगैर्नो; मनो हि मे दूय़ति दह्यते च |  ४   क
वुद्धिं समाच्छाद्य च मे समन्यु; रुद्धूय़ते प्राणपतिः शरीरे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति