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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा विद्रुतां सेनां वासुदेवधनञ्जय़ौ |  ३३   क
प्राय़ातां तत्र राजेन्द्र यत्र शल्यो व्यवस्थितः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति