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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
तुरङ्गममुखैर्युक्तं पिशाचैर्घोरदर्शनैः |  ३५   क
लोहितार्द्रपताकं तं रक्तमाल्यविभूषितम् |  ३५   ख
कार्ष्णाय़समय़ं घोरमृक्षचर्मावृतं महत् ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति