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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
स वभौ राक्षसो राजन्भिन्नाञ्जनचय़ोपमः |  ३७   क
रुरोधार्जुनमाय़ान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् |  ३७   ख
किरन्वाणगणान्राजञ्शतशोऽर्जुनमूर्धनि ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति