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द्रोण पर्व
अध्याय १४२
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सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो हय़ान्हत्वा शरैः संनतपर्वभिः |  ५   क
सारथिं चास्य भल्लेन द्रुतं निन्ये यमक्षय़म् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति