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आदि पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं हि मनसा ध्याता सर्वान्नेष्यामि वः सदा |  ११   क
वृजिने तारय़िष्यामि दुर्गेषु च नरर्षभान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति