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विराट पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
सवज्राय़सगर्भं तु कवचं तप्तकाञ्चनम् |  १०   क
विराटस्य प्रिय़ो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारय़त् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति