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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यसम्भारसंय़ुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप |  १८   क
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोय़ाभिरेव तु ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति