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विराट पर्व
अध्याय ५
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युधिष्ठिर उवाच
धनञ्जय़ समुद्यम्य पाञ्चालीं वह भारत |  ७   क
राजधान्यां निवत्स्यामो विमुक्ताश्च वनादितः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति