शल्य पर्व  अध्याय २८

सञ्जय़ उवाच

स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम् |  ४१   क
उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तदा दीनमवस्थितम् ||  ४१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति