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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्ममूलं जगद्राजन्नान्यद्धर्माद्विशिष्यते |  ४७   क
धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन्निषेवितुम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति