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वन पर्व
अध्याय ३०
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युधिष्ठिर उवाच
तां क्षमामीदृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत् |  ४०   क
यस्यां व्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च विष्ठिताः |  ४०   ख
भुज्यन्ते यज्वनां लोकाः क्षमिणामपरे तथा ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति