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सभा पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः |  २९   क
दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति