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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
ते यथानन्तरान्वृक्षान्वल्मीकान्विषमाणि च |  १२   क
पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वाय़ोर्निलिल्यिरे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति